बिखरी हुई चूड़ियां bacchon ki kahani


bikharee huee choodiyaan बिखरी हुई चूड़ियां
bikharee huee choodiyaan बिखरी हुई चूड़ियां

हरा पॉपलिन का बुशर्ट , काला पेंट , पैरों में चप्पल।

हैंडीक्राफ्ट कंपनी  के मालिक ने निकाल दिया था उसे ।

पुलिस से छिपता - छुपाता रेल पटरी का सहारा ले आगे बढ़ता

जा रहा है । मुकेश की नजर कुछ पल के लिए ठहर गई । एक

मजदूर को देख कर । उसके साथ उसकी पत्नी माथे पर गठरी
बांधे , बेटी का हाथ पकड़ चले आ रही है । रेखु नाम बताया

उसने । मुकेश से मुखातिब होते हुए , हम शहर में कमठे पर

काम करते हैं । ' वे दोनों बतिया रहे थे कि उन्हें और मजदूर

आगे चलते दिख पड़े । काफिला सा हो गया विस्थापित

मजदूरों का । उन्हें भरोसा सिर्फ अपने पैरों पर है । मुश्किल

दूरी को पाट लेना चाहते हैं । उन्हें अपने आप पर विश्वास है

कि एक दिशा में लगातार चलते रहने के बाद रास्ता गांव की

पगडंडी थाम लेगा । वे भूखे मरने से पहले लौट जाना चाहते हैं

अपने गांव । सभी आंखें ख्वाहिशों से नम थीं । किसी की

आंख में अपने ब्याव के सपने हैं । कुछ की आंख में अपने बूढ़े

मां - बाप की लाचारी । कुछ आंखों में पीछे छूटे शहर की

तस्वीर , तो किन्हीं आंखों में गांव के खेत और झोपड़ी हैं ।

ज्येष्ठ मास का तपता सूरज शरीर को दहला रहा है । रेल पटरी

बीचों बीच । आसपास जंगली लताओं से ढंके पेड़ । सुलगती

धूप में ऊंघती झाड़ियां ।

चलते - चलते सभी के चेहरों पर रास्ते की थकान उतर आई ।

कुछ के पैरों में पहनने के लिए चप्पल नहीं है । एक मजदूर ने

तपती धूप से बचने के लिए अपने पैरों में प्लास्टिक की बोतलें

कपड़े की लीर से बांध ली । एक मजदूर के एक पांव में जूता

तो दूसरे पांव में चप्पल । शायद कचरे में से बीन लाया ।

लुगाइयां भी बहुत थक गई थीं । उनकी हिम्मत ने साथ छोड़

दिया । खासकर छोटे - छोटे बच्चे जिनके पैदल चल चलकर

पैर छिल गए । सभी ने सोचा • की विश्राम कर लें । थोड़ी

छाया देखकर । फिर आगे का सफर तय करेंगे । अचानक रेखु

की बेटी दर्द से चीख पड़ी । ' अम्मा पेट बहुत दुख रहा है । ' '

ले पानी पी ले । बावली धूप है । ' ' नहीं अम्मा पानी नहीं गिटा

जा रहा । ' रेखु की लुगाई ने कहा यह रास्ते भर से पेट दर्द

बता रही थी । मैंने सोचा बहाना बना रही है । इसको चलना

नहीं । जंगल में कहां इलाज पड़ा ? सभी विकल्पहीन । वह

बच्ची पेट पकड़े मछली की तरह तड़प रही है । थोड़ी देर में

उसकी सांसें उखड़ने लगीं । रेखु की लुगाई का क्रंदन सभी का

कलेजा चीर रहा । उस बच्ची की सांस में अम्मा के तार टूट के

बिखर गए । रेखु ने उसका हाथ पकड़ा था , उसकी पकड़

ढीली हो गई । चेहरा एक तरफ लटक गया । शरीर थोड़ी देर

पहले बफारे मार रहा था । अब ठंडा पड़ चुका है । गरीबी

जीवन का अभिशाप है । जो इससे अभिशप्त हैं , वही जानते

हैं कि रोज कितने नरक भोगने पड़ते हैं । चलते - चलते

सांझ ढल आई । अब जंगल भी घना हो चला था । थोड़ी सही

जगह दिखी । वहीं डेरा जमा लिया । मुकेश के पास उसकी

उम्र का छोरा लेटा था । मुकेश मोबाइल निकाल कर कुछ

देखने लगा । पास वाले छोरे ने उसे छेड़ते हुए , क्या रे तेरी

शादी हो गई । ' ' नहीं । एक लड़की है , जिसके साथ मन बंध

गया । सुगनी नाम है उसका । मेरा और उसका बापू दोनों साथ

कमठेपर जाते हैं । बापू कहता है कि दोनों का जन्म एक ही

दिन हुआ था । मैं उससे कुछ घंटे छोटा हूं । मां कहती है कि

दोनों का गठजोड़ उसी दिन बंध गया था । जिस दिन जन्मे । '

' ब्याव कब करेगा उससे ? ' ' पहले गांव तो पहुंच जाऊं । जब

भी हमारे ब्याव की बात आती है , कोई अड़चन दरवाजे पर

टंगी मिलती है । ' अब भाल्या नम का सावा है । उसके साथ

ब्याव करना मेरा पहला सपना है ।

लेकिन मेरे मन में एक अजीब सा डर है । उसने लाल रंग की

चूड़ियां मंगवाई थी । कहा था , हाथ भर लाना । दोनों हाथ

चूड़ियों से भर लूंगी । मैंने उसकी पसंद का लहंगा भी खरीदा

है । कहती है कुछ मत लाना । एक बार आ जा । ' मुकेश ने

अपने मोबाइल में उसका फोटो दिखाते हुए कहा । ' रुपाळी है

थारी लुगाई । अभी तो काफी दिनों से बंद है । ' ' अमावस पर

छुट्टी पड़ती है । मैं और मेरा साथी गांव जाने वाले थे । वह

गांव चला गया और मैं उसके साथ नहीं जा पाया । ' मुकेश

और उसके सभी साथी पटरी पर निश्चिंत होकर लेट गए ।

आसपास घना जंगल था , सोने की उपयुक्त जगह नहीं दिखी

। यह सोचते हुए कि रेल तो सरकार ने बंद कर रखी है । अभी

हमें यहां कोई खतरा नहीं । उन विस्थापितों का हाड़ मांस का

शरीर निचुड़ा हुआ । बिना सार के पटरियों पर खाली हो गया

। वक्त भावनाओं और संवेदनाओं का हर आधार सोख लेता है

। निरर्थकता के बोझ तले अपने अस्तित्व को दबाकर वह रोज

मरता है । घनी रात में भय के साथा वन के भीतर निस्तब्धता

थी । जैसे युगों से साधना में लीन कोई ऋषि मुनि ।

अविचलित , अचंचल । चांद जैसे रुआंसा हुआ जा रहा था ।

देखो कितना पीला पड़ गया चेहरा ना और वो ढूंढ रहा बादलों

की ओट जहां वो छुप जाए कि अचानक धड़धड़ाती मालगाड़ी

उन सबको कुचलती चीखती गुजर गई । पटरी पर बिखर गई

लाल चूड़ियां । जिनमें रोती हुई दिशाएं अपने क्षितिज में समा

गई ।

Post a comment

1 Comments

Please do not enter any spam link in the comment box.