इतज़ार kahani in hindi

इतज़ार 

kahani in hindi

 मसाले मायके की ख़ुशबू ले आते हैं। माँ के स्नेह की पुकार सुनाई देने लगते है। यह इंतज़ार दो तरफा है।


इतज़ार kahani in hindi
इतज़ार kahani in hindi

मैं ने जैसे ही चीनी मिट्टी की बरनी में चमचा डाला तो पटाकी आवाज़ के साथ चमचा बरनी के पेंदे से टकराया। बरनी टेढ़ी कर अंदर झांका तो उसमें अचार ख़त्म हो चुका था, अब सिर्फ़ तेल में सने सौंफ और मेथी के दाने छितरे पड़े थे। अचार तो ख़त्म हो गया था पर उसकी ख़ुशबू ने माँ के हाथ के बने कैरी के अचार के स्वाद की याद ताज़ा कर दी जिससे मेरे मुंह के साथ-साथ आंखों में भी पानी भर आ गया। 

मैं बालकनी में जाकर खड़ी हो गई। हर साल तो इन दिनों मैं माँ के आंचल की छांव में उसकी ममता के हिलोरों का आनंद ले रही होती हूँ। इन चंद दिनों का तो मैं पूरे साल बेसब्री से इंतज़ार करती हूँ और करूं भी क्यों न, यहाँ आकर मैं अपने बचपन में लौटती हूँ और माँ नाम की जादुई परी पलक झपकते ही मेरी सारी तकलीफों को दूर कर देती है।

 माँ, उसके उत्साह के तो कहने ही क्या ... वह तो जाने कितने महीनों पहले से मेरे आगमन की तैयारियाँ शुरू कर देती है। मेरा मायके जाना किसी उत्सव से कम नहीं होता है। नित नए पकवानों की ख़ुशबू से घर महका रहता है। मेरे पहुँचते ही माँ मेरी अटैची के पास मुझे देने के सब सामानों का एक कोने में ढेर लगाना शुरू कर देती है। साल भर डाले गए अचार, मुरब्बे, मसाले, सुखाई हुई थी

  ये काचरी, ग्वार, खिचिए, मंगोड़ी और भी ना जाने क्या-क्या। में मैं बनावटी गुस्से के साथ माँ को कहती भी हूँ कि क्या माँ! मेरे आते ही मुझे वापस भगाने की तैयारी भी शुरू कर दी। 'लाड़ो, ग्रह-नक्षत्र और ब्याही बेटी अपने-अपने घरों  में ही शोभा देते हैं।' तो क्या मैं ये मानूं कि आप मुझे राहू कह रही हैं? नहीं रे ... तू तो मेरी आंखों का नूर है। मैं तो ये सब इसलिए रखती जाती हूँ जिससे जल्दबाजी में कोई सामान छूट न जाए, 

' माँ मुझे लाड़ लगाते हुए कहतीं। जैसी अनोखी माँ, वैसे ही अनोखे उसके तर्क। मेरी शादी को इतने साल हो गए थे पर आज भी माँ के हाथ से तैयार मसाले ही मेरी रसोई को महका रहे हैं। सुबह की चाय के मसाले से लेकर रात के हल्दी वाले दूध तक ... माँ को कितनी बार समझाया है ये सब बाज़ार से भी खरीद सकती हूँ, पर नहीं ... कहती हैं, ये मसाले तो जान हैं भारतीय रसोई की, जिनमें स्वाद भी है और सेहत भी। इनके साथ किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए। पर इस साल की बात अलग है। लॉकडाउन भले ही खुल गया है किंतु महामारी के प्रकोप में कमी नहीं आई है। बीमारी से बचने के लिए सब अपने घरों में सिमट जाने को मजबूर हैं। ऐसे में बहुत आवश्यक न होने पर यात्रा करना भी मुनासिब नहीं था।

 फिर पति और वृद्ध सास-ससुर
को छोड़कर जाऊँ भी तो किसके भरोसे? पर यादों और जज्बातों का क्या! उन्हें कोई बंधन या सरहद नहीं अड़ती। वे तो पल में कहीं भी पहुँच जाने को आतुर रहते हैं। विचारों में खोए हुए ही मेरी नज़र सामने की सड़क पर खड़ी कैरी की लारी पर गई। हाँ, राजापुरी ही थी। बिलकुल वैसी ही बड़ी-बड़ी जो माँ के अनुसार अचार के लिए एकदम उपयुक्त होती है। मैंने हिम्मत कर मन ही मन एक फ़ैसला लिया और मास्क एवं चप्पल पहनकर उसके पास पहुँच गई। जब मैं लौटी, मेरे हाथ में कैरी से भरा थैला था। मैंने सबसे पहले फ़ोन पर माँ को यह ख़बर सुनाई। माँ ने भी मेरी हौसला अफजाई की और निश्चित हुआ कि कल वीडियो कॉल कर माँ के निर्देशन में अचार बनाने का अभियान चलाया जाएगा। 

मैंने माँ से पूछकर अचार और मुरब्बे में डालने के सारे मसाले एकत्र कर लिए। नियत समय पर माँ के निर्देशन में ये कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। मैंने एक गहरी सांस भर अचार की भरपूर ख़ुशबू ली, बिलकुल माँ के अचार वाली ख़ुशबू थी। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा, जैसे मैंने एवरेस्ट फ़तह कर ली हो। चैन की सांस लेकर थककर बिस्तर पर औंधी पड़ गई। मैंने तो अचार, मुरब्बा बनाकर पूरे साल के लिए पूड़ी और स्वाली का स्वाद सुनिश्चित कर लिया था। रही बात
मसालों की, तो माँ ने आश्वासन दिया कि तेरे यहाँ का कोई साथ मिला तो मैं भिजवा दूंगी। 

लेटे-लेटे मुझे माँ का चेहरा याद आने लगा जिसमें इस साल बेटी के न आने का दुख साफ़ झलक रहा था। माँ ने तो फ़ोन पर मेरी समस्या हल कर दी थी। पर मेरे पास अपनी माँ की मदद के लिए कोई समाधान नहीं है। मेरी आंखों के सामने सारा मंज़र घूम गया। माँ की कुर्सी के पास रखी सिलाई मशीन जिस पर कई चादरें और साड़ियों की किनारियों से लटक रहे छूतरेनुमा धागे, कई उधड़े कपड़ों का जमघट प्रमाण थे कि वह मेरा इंतज़ार कर रही थी। 

माँ के दुखते घुटनों में अब वह ताक़त नहीं रह गई थी कि इतनी देर बैठकर सिलाई मशीन चला चद्दरों के किनारे मोड़ सके या साड़ी की फ़ॉल लगा सके। बारिश के मौसम में गठिया से जकड़ा उसका शरीर मेरे हाथ के स्नेह में पगे स्पर्श की गरमाहट की बाट देख रहा था। उसकी डबडबाई-सी आंखें साल भर में उसके मन के सात तालों में बंद रही-ढेर सारी सुख-दुख की बातों को मेरे सामने खोल घुमड़। जाने को आतुर थीं। 

मुझे अहसास हुआ कि मुझसे ज़्यादा E माँ को मेरी ज़रूरत है। मेरी आंखें पनीली हो गई। मैंने उसकी फ़ोटो हाथ में ले, उसे सीने से लगा उससे वादा। किया 'चिंता मत कर माँ। परिस्थिति सामान्य होने पर मैं न जल्दी ही आऊंगी।'
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दोस्तो यह कहानी आपको कैसे लगी हमें जरूर  बातईगा मै आपके लिए इस तरह की kahani लाता रहता हूं
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